अघोर तथा अघोरमंडल का रहस्य

अघोर तथा महाशमशान

अघोर शब्द का अर्थ है असभ्य अथवा अभद्र आध्यात्मिक अर्थ यह है कि घोर मतलब संसार जो संसार से विरक्त रहे वही अघोर है। जीवन के प्रारम्भिक अवस्था में सभी मनुष्य अघोर ही रहते हैं। प्रत्येक घर में सूतक (मृत) कर्म में तेरह दिन तक शवपूजा होती है। प्रत्येक घर में मृत्यु होती है अतः एक दृष्टया संसार में सभी लोग अघोरी है। अघोर पंथ अत्यन्त सरल सहज और श्रेष्ठ है इसकी विशेषता और अभौतिकता शिव महिम्र स्त्रोत नामक ग्रन्थ में वर्णित है-

 ‘अघोराऽन्ना परोमंत्रो नास्ति तत्वम् गुरौः परम् ।।’ संसार में समस्त सृष्टि के मूल विश्वेश्वर शिव हैं तथा इनके तीन कार्य माने गये हैं-सृजन, पालन, संहार, अष्टांग धर्म तथा मोक्ष। अष्टांग धर्म का अर्थ होता है बुद्धि में स्थित होना इसी को अघोरमुख भी कहते हैं।

स श्रेणी के संतों में औघड़ दानी शिव से लेकर परम अवधूत वेशधारी शुकदेव जी परशुराम के गुरु खंगुनाथ आदि का नाम आता है। अतः अघोरपंथ की उच्चस्थिति में जो भी आया वह सदाशिव का रूप हैं। अपने जीवन के अन्तिम काल खण्ड में लीलाधारी भगवान श्रीकृष्ण जी इस स्थिति में अवस्थित होकर जो कुछ कहा उसे सुख सागर में ‘अवधूतो पाख्यान’ नामक शीर्षक से अलंकृत किया गया है-ऋषभदेव जी ने भी आवागमन से मुक्ति के उद्देश्य से लिंगवत स्वरूप धारण किया। सोलहवी शताब्दी के प्रख्यात अघोरेश्वर बाबा कीनाराम व बीसवीं शताब्दी के महाप्र पूज्यपाद अवधूत भगवान राम इसी सदाशिव के स्वरूप हैं।

अघोर पंथ

अघोर पंथ एक लम्बा मार्ग होता है जिसका लक्ष्य भगवान शिव व शिवलोक है। परन्तु इस मार्ग पर छोटे-छोटे पड़ाव है जिसमें कालावस्त्र धारण करना, मांस मदिरा सेवन अस्थियां व अस्थिपंजर धारण करना, बलि चढ़ाना, शव साधना, श्मशान साधना, कपाल क्रिया आदि। इन अवस्थाओं से पार होने के पश्चात मनुष्य ही सदाशिव का स्वरूप हो पाता है। परन्तु कुछ साधक इन्हीं पड़ावों पर अपने मार्ग से विचलित हो जाते हैं व तंत्र-मंत्र के चक्कर में पड़ कर मदाड़ी का स्वरूप धारण कर लेते हैं। अघोर पद की दूरी तय करने के लिए साधक को अडिग संकल्प व दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। अतः अघोर पंथ बड़ा ही अद्भुत मार्ग है व इसका मुख्य लक्ष्य सदाशिव अर्थात् जगत कल्याण है। अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर अघोर पंथ का मार्ग इतना दुर्गम क्यों है?

इसका उत्तर आपको हमारी अगली पोस्ट में मिलेगा। 

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